पुणे स्थित Biorad Medisys, जो देश की सबसे तेज़ी से बढ़ती मेडिकल डिवाइस कंपनियों में से एक है, अपने बिज़नेस के विस्तार और नए क्षेत्रों में कदम रखने के लिए प्राइवेट इक्विटी या स्ट्रैटेजिक निवेशकों से फंड जुटाने की तैयारी में है।
कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर जे. एम. हेगड़े ने Moneycontrol से बातचीत में कहा – “हमने कभी दरवाज़ा बंद नहीं किया। आने वाले समय में कंपनी को अगले स्तर तक ले जाने के लिए हमें फंड की ज़रूरत होगी।”
पिछले साल कंपनी ने 350 करोड़ रुपये जुटाए थे, जिसका इस्तेमाल पुराने कर्ज़ चुकाने और दो नई फैक्ट्रियों (बेंगलुरु और शिरवाल में) के लिए किया गया। इसके साथ ही भारत और विदेशों में कंपनी का दायरा बढ़ाने के लिए भी यह पैसा लगाया गया। हेगड़े के अनुसार, “ये सुविधाएं आने वाले पांच साल तक यूरोलॉजी, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और रोबोटिक्स की मांग पूरी करने में मदद करेंगी।”
मेडिकल डिवाइस पार्क और तेज़ ग्रोथ
कंपनी पुणे के पास 30 एकड़ ज़मीन पर मेडिकल डिवाइस पार्क बना रही है, जिसे आगे चलकर 100 एकड़ तक बढ़ाने की योजना है। हेगड़े कहते हैं – “हम सिर्फ़ मैन्युफैक्चरिंग नहीं, बल्कि इनोवेशन, ट्रेनिंग और ग्लोबल कनेक्शन वाला पूरा इकोसिस्टम बनाना चाहते हैं।”
बायोराड की ग्रोथ भी तेज़ रही है –
- FY23 में राजस्व ₹230 करोड़
- FY24 में ₹360 करोड़
- FY25 में लक्ष्य ₹550 करोड़ से ज़्यादा
पिछले तीन सालों में कंपनी की औसत सालाना ग्रोथ 56% CAGR रही है। इसकी वजह बेहतर प्रोडक्ट क्वालिटी, सरकार के साथ साझेदारी और मज़बूत एक्सपोर्ट्स मानी जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बढ़ता कदम
कंपनी की 28% कमाई एक्सपोर्ट से आती है। इसका Indovasive (consumable) डिवीजन सबसे आगे है। बायोराड यूरोपियन मार्केट में प्रवेश कर चुकी है और रूस, वियतनाम समेत कई देशों में अपने ऑर्थोपेडिक प्रोडक्ट रजिस्टर करा रही है। हाल ही में स्विट्ज़रलैंड में हुई एक खरीदारी से इसका अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और तेज़ी से बढ़ेगा।
रिसर्च और नई टेक्नोलॉजी पर निवेश
बायोराड हर साल अपनी कमाई का 4% रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में खर्च करती है और इसके लिए 200 से ज़्यादा इंजीनियर काम कर रहे हैं।
- कंपनी ने भारत में 3D प्रिंटेड इम्प्लांट्स की शुरुआत की।
- ETH Zurich यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर अपना सर्जिकल रोबोट भी बना रही है।
ग्लोबल टॉप 15 में शामिल होने का लक्ष्य
बायोराड का मकसद अगले कुछ सालों में बिलियन-डॉलर कंपनी बनने और दुनिया की टॉप 10-15 मेडिकल डिवाइस कंपनियों में जगह बनाने का है। हेगड़े कहते हैं – “हम पहले से ही 50 से ज़्यादा देशों में मौजूद हैं। भारत में वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग और हमारी डाइवर्स प्रोडक्ट लाइन हमें वैश्विक स्तर पर अलग पहचान दिलाएगी।”
कंपनी का सफर
- 2000 में बेंगलुरु में कुछ NRI और डॉक्टरों ने मिलकर सस्ती कार्डियक कैथेटर्स बनाने के लिए कंपनी की शुरुआत की।
- लेकिन शुरुआती दिनों में प्रोडक्ट्स को बाज़ार में जगह नहीं मिल पाई।
- 2007 में जे. एम. हेगड़े ने कंपनी को खरीदा और इसे हाई-टेक मेडिकल डिवाइस मैन्युफैक्चरर के रूप में नए सिरे से खड़ा किया।
आज कंपनी ऑर्थोपेडिक्स, यूरोलॉजी, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, न्यूरोलॉजी और नई उभरती टेक्नोलॉजी जैसे रोबोटिक्स, स्ट्रोक रिहैबिलिटेशन और डिजिटल हेल्थ में डिवाइस बनाती है। इसके पोर्टफोलियो में कृत्रिम घुटना-हिप जॉइंट्स, सर्जिकल उपकरण, पंप्स, स्कोप्स और 3D-प्रिंटेड इम्प्लांट्स शामिल हैं।
भारतीय मेडिकल डिवाइस बाज़ार
- FY24 में भारत का मेडिकल डिवाइस मार्केट 12 बिलियन डॉलर (₹1.02 लाख करोड़) का था।
- 2030 तक इसके 50 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है (16.4% CAGR)।
- भारत अभी एशिया का चौथा सबसे बड़ा मेडिकल डिवाइस बाज़ार है (जापान, चीन और दक्षिण कोरिया के बाद) और दुनिया में टॉप 20 में शामिल है।
फिर भी, भारत की 70-80% ज़रूरतें अब भी इंपोर्ट से पूरी होती हैं। यही घरेलू कंपनियों जैसे बायोराड के लिए बड़ा अवसर है। विदेशी प्राइवेट इक्विटी फंड्स और फार्मा कंपनियां भी इस सेक्टर में निवेश को लेकर उत्साहित हैं।
निष्कर्ष (Disclaimer)
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